मद्रास हाईकोर्ट ने कहा है कि पति की पहली शादी से अनजान दूसरी पत्नी पर बिगैमी (दूसरी शादी) का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसी महिला पति की रिश्तेदार नहीं मानी जाएगी। इसलिए उस पर BNS की धारा 85 के तहत क्रूरता का केस भी नहीं चलेगा। जस्टिस एन रमेश ने 15 सितंबर को राजलक्ष्मी बनाम द स्टेट मामले में यह फैसला सुनाया। महिला ने गिरफ्तारी से बचने के लिए अग्रिम जमानत की याचिका लगाई थी। यह मामला ऑल वुमन पुलिस स्टेशन में दर्ज केस से जुड़ा था। केस पति की पहली पत्नी की शिकायत पर दर्ज हुआ था। इसमें BNS की धाराएं 82, 85, 49, 296(b) और 351(2) लगाई गई थीं। याचिकाकर्ता महिला ने कहा कि शादी के समय उसे पति की पहली शादी की जानकारी नहीं थी। पति ने यह बात उससे छिपाई थी। महिला ने कहा कि इस मामले में उसे धोखा दिया गया और वह अपराध में शामिल नहीं थी। कोर्ट ने क्या कहा कोर्ट ने कहा कि BNS की धारा 85, IPC की धारा 498A के अनुरूप है। यह धारा किसी महिला के पति या पति के रिश्तेदार की ओर से की गई क्रूरता पर लागू होती है। न्यायमूर्ति एन रमेश ने कहा कि यह प्रावधान सामान्य तौर पर हर व्यक्ति पर लागू नहीं होता। यह पति और उसके रिश्तेदारों तक सीमित है। रिश्तेदारी आम तौर पर खून, शादी या गोद लेने के रिश्ते से बनती है। कोर्ट ने कहा कि जिस दूसरी पत्नी को पति की पहली शादी की जानकारी नहीं थी, वह पति की रिश्तेदार नहीं मानी जा सकती। ऐसे मामलों में पति दोनों महिलाओं को धोखा देता है। इसलिए दोनों महिलाओं को आरोपी और पीड़ित नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के सागरी हेमब्रम बनाम स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल एंड एनआर मामले का भी हवाला दिया। यह फैसला 2024 SCC ONLINE CAL 10278 में दर्ज है। कलकत्ता हाईकोर्ट ने IPC की धाराओं 498A, 494, 406 और 506 के तहत दूसरी पत्नी के खिलाफ कार्रवाई रद्द कर दी थी। कोर्ट ने कहा था कि IPC की धारा 494 उस व्यक्ति पर लागू होती है, जो वैध शादी के रहते दूसरी शादी करता है। यह धारा उस व्यक्ति पर लागू नहीं होती, जिससे वह दूसरी शादी करता है। मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि यही तर्क BNS की धारा 85 पर भी लागू होता है। बिगैमी के प्रावधान पर टिप्पणी कोर्ट ने कहा कि BNS की धारा 82, IPC की धाराओं 494 और 495 के अनुरूप है। यह धारा उस व्यक्ति को सजा देती है, जो पहली शादी के दौरान, जबकि पहला जीवनसाथी जीवित हो, दूसरी शादी करता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर आरोपी ने दूसरी शादी करने वाले व्यक्ति से पहली शादी की बात छिपाई हो, तो इस प्रावधान के तहत सजा बढ़ जाती है। कोर्ट ने धारा की सीधी भाषा का हवाला देते हुए कहा कि बिगैमी का आरोपी वही व्यक्ति होता है, जिसका जीवनसाथी पहले से जीवित है। कोर्ट ने कहा, “जो महिला खुद अविवाहित है और पहली शादी की जानकारी के बिना ऐसे व्यक्ति से शादी करती है, वह सिर्फ इसी वजह से BNS की धारा 82 के तहत आरोपी नहीं बन जाती।” कोर्ट ने यह भी कहा कि दूसरी पत्नी को जानकारी या उसकी भागीदारी दिखाने वाली कोई सामग्री नहीं होने पर उसे मामले में नहीं घसीटा जा सकता। अग्रिम जमानत मंजूर कोर्ट ने कहा कि इस मामले में याचिकाकर्ता को पति की पहली शादी की जानकारी नहीं थी। इसलिए वह BNS की धारा 82(1) के तहत अपराधी नहीं है। कोर्ट ने कहा कि BNS की धारा 82(2) के तहत महिला से हिरासत में पूछताछ जरूरी नहीं है। जानकारी नहीं होने का उसका दावा जांच का विषय है। क्रूरता के केस पर कोर्ट ने कहा कि महिला पति की रिश्तेदार की श्रेणी में नहीं आती। उसे भी पति ने पहली शादी की जानकारी छिपाकर धोखा दिया था। इन बातों को देखते हुए कोर्ट ने माना कि महिला ने अग्रिम जमानत का मामला बनाया है। कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ उसकी याचिका मंजूर करने की सहमति जताई। याचिकाकर्ता की ओर से एस. पार्थिबराजन ने पैरवी की। सरकार की ओर से सरकारी वकील आर. राजशेखरन ने पक्ष रखा। मामले का शीर्षक राजलक्ष्मी बनाम द स्टेट है। इसकी सिटेशन 2026 LiveLaw (Mad) 445 है। केस नंबर CRL OP No 22231 of 2026 है।